Wednesday, August 26, 2020
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सिवनी : पुश्तैनी माटीकला को नया आयाम दे रही बेटियां

सिवनी : परम्परागत तरीके से चली आ रही माटीकला को उगली की दो बेटियां नया आयाम दे रही है। गरीबी और लाचारी से तंग होने के बावजूद उगली की दो बेटियां पढाई के साथ-साथ पिता के कंधो से कंधे मिलाकर परम्परागत माटीकला को बचाने का प्रयास कर रही हैं। मिटटी के बर्तनों पर आकर्षक कलाकारी कर लोगों को माटीकला की ओर आकर्षित कर रही है,लेकिन माटीकला की इन कलाकृति के लिए बेहतर मंच और अच्छे दाम न मिलने से माटीकला के ये कलाकार हताश होने के साथ-साथ आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं। वहीं वैश्विक महामारी कोरोना ने कविता बबीता के परिवार के साथ साथ कुम्हारों की भी कमर तोड़ दी है। ऐसे में कविता बबीता की नायब कलाकारी से बनाई गई कलाकृति उनके परिवार के जीवन यापन के लिए कुछ हद तक मददगार साबित हो रही है।

रामकिशोर प्रजापति लकड़ी के चाक से सालों से मिटृटी के घड़े और गमले ही बनाते चले आ रहे थे , एक सीजन में ही बिकने के बाद उनका कामकाज बंद हो जाता है। उन्हें आर्थिक संकट से जूझना पड़ता है ऐसे में कविता और बबीता कलम के साथ मिटृटी को भी अपने हाथों में लेकर पिता द्वारा बनाई जा रही मिटृटी की कलाकृति में नये रंग भर रही है। यह बेतिया अपने पिता को मटके और गमले बनाने की पुस्तैनी कला के साथ-साथ आदिकाल में उपयोग होने वाले मिटृटी के बर्तन और घरों में साज – सज्जा के रुप में उपयोग होने वाली कलाकृति सिखा रही है। बेटियों की बनाई गई कलाकृति इतनी सुंदर और मनमोहक है कि बेचने के लिए सडक पर रखी हुई उनकी कलाकृति को लोग टकटकी लगाकर देखते रह जाते हैं। कलाकृति की कदर करते हुए कुछ लोग उन्हें खरीदकर भी ले जाते हैं।

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